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एक ऐसी भी महिला है जो हर ज़रूरत का सामान लाने के लिए कितनी दूर चली जाती है

लेखिका – सुश्री कुसुम पाण्डेय

एक ऐसी भी महिला है : आज हम बात कर रहे है एक ऐसी महिला के बारे में जिसने अपनी आधी उम्र लगा दी अपने परिवार को पालने में लेकिन आज सब उसके खिलाफ हो गए क्यों ? क्या कसूर है उस गरीब महिला का ? यही कि उसने कभी अपने बारे मे नहीं सोचा सिर्फ अपने पति और बेटा-बेटी के बारे में पहले सोचा ,उनके लिए हर ज़रूरत का सामान लाने के लिए कितनी दूर चली जाती है वह पर उसकी याद किसी को न आती है|

उसके बेटे का विवाह हो चूका है लेकिन बहु के साथ उसकी निभ नहीं रही| रोज घर में नया नाटक होता है| बेटा भी बहु का ही साथ देता है और माँ को ही गलत साबित कर देता है। बेटा घर से बहु के साथ चला गया उसके बाद से माँ बीमार है बेटे ने कोई हाल तक नहीं लिया।

कलयुग चल रहा है जनाब अपने पराये और पराये अपने हो जाते है। आज कल के माता पिता की स्थिति दयनीय है| माता पिता तो अपने फर्ज निभाते हैं परंतु बच्चे अपना फर्ज भूल जाते हैं।

मैं पूछना चाहती हूं उस बेटे से जो अपनी मां के प्रति अपने कर्तव्य को भूल गया| एक माँ बीमार पड़ी हुई है बिस्तर पर और वह उसकी तरफ पलट कर के देख भी नहीं रहा ? क्या वह भूल गया कि उसकी मां ने उसको 9 महीने अपने कोख में रखकर जन्म दिया? कैसा बेटा है यह ? पराई स्त्री के लिए अपने सारे कर्तव्य फर्ज को भूल चुका है ,उस माँ पर क्या गुजर रही होगी!

मैं हिंदुस्तान की हर महिला से यह गुजारिश करना चाहती हूं कि वह अपने आप को इतना मजबूत करें कि उसे अपनी जिंदगी में किसी की जरूरत ना महसूस हो फिर वह चाहे औलाद ही क्यों ना हो। अपने हाथ पैरों को इतना मजबूत करें कि अपने लिए किसी के सहारे की जरूरत उसको कभी महसूस ना हो।

एक ऐसी भी महिला है : आज के समय में …….

आज के समय में अगर हम अपने बच्चों को उनकी गलती का एहसास दिलाते हैं तो वह उल्टा हमारी ही कमियों और गलतियों को गिनाते है।

माता पिता को भी यह समझना चाहिए कि जब वह अपने बेटे या बेटी की शादी करते हैं तो वह दो भागों में बंट जाते है। उनके ऊपर एक जिम्मेदारी और आ जाती है जिसको कि उनको निभाना जरूरी होता है। उनकी भी इच्छाएं होती हैं उनकी भी खुशियां होती है उनको भी अपनी जिंदगी जीने का पूरा अधिकार है।

आज के समय में अगर हम चाहते हैं कि हमारे परिवार में कोई किसी तरह का कलह ना हो तो हम अपने बच्चों की जिंदगी को उनके हिसाब से जीने दे, ज्यादा दखलअंदाजी ना करें।

एक ऐसी भी महिला है : मैं उस औरत को यही समझाना चाहती हूं कि शांति से रहे और अपने बच्चों को शांति से जीने दे। बच्चे को लड़के को अपनी जिम्मेदारी उठाने दे। अगर वह अलग रहना चाहता है अपनी पत्नी के साथ तो उसको रहने दे। उसको भी अपने जिम्मेदारियों का एहसास होने दे। कब तक माता पिता जो है सारा कुछ अपने ही सर पर ले कर उस बोझ को उठाएंगे।

माता – पिता को अपने बच्चों को अपने पैरों पर खड़े होने का पूरा मौका देना चाहिए ताकि वह अपने आने वाले समय में खुशी खुशी जी सकें और अपनी जिंदगी को सुचारु रुप से चला सके तथा माता पिता स्वयं भी खुश रहें, उन्हें भी किसी प्रकार का कोई दुख या तकलीफ ना हो। वह बच्चों को समझे और ब्च्चे अपने माता पिता की मजबूरियों और कष्टों को भी समझने का प्रयास करें।

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